Monday, April 12, 2010

क्या एमएफ हुसैन से गए गुजरे हैं अमिताभ?

क्या एमएफ हुसैन से गए गुजरे हैं अमिताभ?अमिताभ बच्चन विशुद्ध रूप से एक कलाकार हैं। भारत वर्ष में उनके जितनी लोकप्रियता और कला के प्रति समर्पण कायम रखने वाला कोई दूसरा उनके समीप तक नहीं दिखाई देता। चाहे चित्रकार एमएफ हुसैन ही क्यों न हों। आज देश की एक पार्टी ने सदी के महानायक की संवेदना पर प्रश्न चिह्न लगाया है। इससे अमिताभ के करोड़ों चाहने वालों में रोष
है। याद होगा जब महाराष्ट्र में आए भूकंप के दौरान इन्होंने न केवल अपने दम एक गांव के पुर्नवास का खर्चा भी दिया साथ ही दान भी दिया। ऐसे ही तमाम मौकों पर ऐसा काम करके अपने सामाजिक दायित्व का न केवल निर्वहन करते रहे हैं बल्कि बॉलीवुड के अन्य सितारों के सामने भी एक मिसाल कायम की है। उनकी विनम्रता और संवेदनशीलता की पूरी इंडस्ट्री कायल है। वहीं, एक अन्य कला क्षेत्र के महारथी चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने तमाम विवादास्पद चित्र बनाए वो भी खासकर एक
समुदाय के, और सैकड़ों की संख्या में कला के तथाकथित समर्थक सामने आए और गुजरात में मोदी सरकार के खिलाफ और कला की आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी का वास्ता देकर प्रदर्शन किया। मोदी की नजर में गुजरात को बदनाम करने का काम किया। सही का साथ देने का प्रयास कब से संवेदनहीनता हो गई पता ही नहीं चला।
अमिताभ जैसे महान कलाकार को देश की कथित तौर पर सेकूलर पार्टी ने संवेदनहीन बताया और उनका सार्वजनिक तौर पर अघोषित बहिष्कार कर डाला। पार्टी के हाइकमान की भूमिका कितनी है यह तो कहा नहीं जा सकता किंतु अमिताभ के गुजरात राज्य के ब्रैण्ड अम्बेसेडर बनने के विरोध के नाम पर उनके समकक्ष खड़े होने का प्रयास भी किया। कलाकारों के राज्य में कलाकार का अपमान हुआ और प्रदेश का मुख्यमंत्री उसका हिस्सेदार बने इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। किंतु पार्टी की अघोषित नीति का अनुसरण किसी भी पार्टी कार्यकर्ता के लिए करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। एक और तो पार्टी हर मौके पर देश के संविधान की दुहाई देती है तो दूसरी ओर एक अंत:निहित सत्य की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री किसी भी पार्टी का नहीं रह जाता। चलिए मान लिया कि आज अमिताभ कथित रूप से साम्प्रदायिक मोदी के साथ खड़े हुए। परंतु तब ये पार्टी और ये कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का परचम लहराने वाले ठेकेदार कहां गए थे जब राज ठाकरे और उनके गुंडों ने सरेआम न केवल इस महान कलाकार को धमकी दी बल्कि उनके गुंडे कई थिएटरों में तोड़फोड़ करते आजाद घूमते रहे।
एक भी कलाकार मुंबई की सड़कों पर अमिताभ और उनके परिवार की रक्षा तथा कलाकारों के अधिकारों की दुहाई देने को सामने नहीं आया। आखिर क्यों? क्या वो कलाकार जो गुजरात में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे वह मानते थे कि गुजरात में एक संवैधानिक सरकार है और महाराष्ट्र में गैर-संवैधानिक सरकार। यानि मोदी सरकार कानून के दायरे में काम करेगी और तब की देशमुख सरकार कानून का पालन नहीं करेगी। या फिर कुछ संगठनों का दावा कि यह सब प्रदर्शन प्रायोजित था, में कुछ सच्चाई है। क्या एक बार भी सच का साथ देने की हिम्मत इन कथित कला के समर्थकों में न थी।बॉलीवुड के कलाकार अमिताभ भी हैं और शाहरुख भी हैं। अमिताभ का कद शाहरुख से काफी ऊंचा है। चलिए मान भी लिया लिया जाए कि समान है, तब क्या एक कलाकार की फिल्म रिलीज करवाने और सुरक्षा देने के लिए पुलिस को सख्त निर्देश दिए जाएं और दूसरे पर सरेआम अत्याचार होता रहा और सरकारें (केंद्र व राज्य) की आँखें मूंदे रहीं, कान में रूई डाले रहीं। आखिर क्यों सवाल तब भी खड़े हुए थे और आज भी यथावत खड़े हैं।

No comments: