बारिश में किसी की दीवार ढह गयी,
कोई चीख निकली, कोई दब गयी,
किसी की गली धंस गयी,
कहीं पर सड़क बह गयी;
किसान खेत में मेड़ बनाए,
ऊपर से पानी झमाझम आये,
फसल न बह जान की भी चिंता,
अच्छी फसल उगाने की है मंशा
मजदूर हाथ पर हाथ धरे है,
उसकी दिन की दिहाड़ी रह गयी;
कल की चिंता उसे सता रही
रोटी के जुगाड़ में लगी जनता,
अनाज गोदामों में सरकार सड़ा रही,
भूख से बिलखती ज़िंदगी सो रही,
जनता सबकुछ चुपचाप सह गयी।
हाय रे लोकतंत्र,,,
आम आदमी की व्यथा,
सरकार मानसून के आंकड़ों में कह गयी.