Friday, December 12, 2008

थोथे वादे नहीं, काम को सलाम

सलाम दिल्ली, जी हां दिल्ली के सम्माननीय नागरिकों का तहे दिल से स्वागत किया जाना चाहिए कि उन्होंने किसी भी प्रकार की भावनाओं के वेग में बहने के बजाय सूझ-बूझ का परिचय दिया। दिल्ली ने साबित कर दिया कि उसके पास दिल है और दिमाग भी। पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय देकर दिल्ली के लोगों ने एक उदाहरण पेश किया है कि सरकारें भावनाओं के आवेग में नहीं बहुत आराम से सोच समझ कर चुनीं जाती हैं।चुनाव विश्लेषकों में शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने यह बात कही होगी कि मुंबई धमाकों के बाद भी 29 नवंबर को हुए मतदान में दिल्ली की जनता कांग्रेस पार्टी के पक्ष में मत जाहिर करेगी और शीला दीक्षित की हैट्रिक बनवाएगी।सच है, साबित हो चुका है कि कई विश्लेषक गलत साबित हुए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कई विश्लेषक यह मान रहे थे कि दिल्ली में बदलाव की बयार है और विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी एक मजबूत पार्टी है। सो भाजपा की सत्ता में वापसी के आसार है। लेकिन वहीं उनका यह भी मानना था कि दिल्ली में भाजपा कम से कम स्वीप तो नहीं कर सकती।कारण साफ था कि शीला दीक्षित के काम का वजन दिल्ली की राजनीति में वाकई काफी भारी है। यह कारण था कि जो भी विश्लेषक यह मान रहा था कि भाजपा आएगी वह किसी भी गणित से यह दावा नहीं कर सकता था कि भाजपा ही आएगी। लेकिन 26 नवंबर को मुंबई में आतंकियों का अब तक का सबसे बड़ा हमला, जिसे पूरे देश ने दिल थाम कर दिन-रात पूरे तीन दिनों तक देखा। इससे अधिकांश विश्लेषकों ने यह मान ही लिया था कि अब दिल्ली में कांग्रेस को जी हां कांग्रेस को (शीला दीक्षित को नहीं) कोई नहीं बचा सकता, क्योंकि दिल्ली विधानसभा के लिए मतदान ही 29 नवंबर को होना था।मतदान शांतिपूर्वक हुआ और भाजपा पूरी तरह आश्वस्त हो चुकी थी कि उसका प्रत्याशी यानी डॉ विजय कुमार मल्होत्रा ही अगले मुख्यमंत्री होंगे। आश्चर्य तो यह कि कई टीवी चैनल भी डॉ मल्होत्रा को सीएम इन वेटिंग के रूप में भी दिखाने लगे। भाजपा नेता और मुखर हो गए। कांग्रेस पर कड़े प्रहार किए, देश में आतंक के लिए कांग्रेस पार्टी को ही जिम्मेदार बता डाला। डॉ मल्होत्रा ने यहां तक कह डाला कि उनके सत्ता में आने पर बीआरटी कोरिडोर परियोजना पर पुनर्विचार किया जाएगा।जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास अधिकतर हानिकारक ही होता है। डॉ मल्होत्रा शायद यह भूल गए थे कि बीआरटी से जिन्हें फायदा है, वे ही मतदान के लिए लम्बी कतारों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर वोट डालते हैं न कि बीआरटी से परेशान लोग जो पांच मिनट लाइन में खड़े होने पर सरकार और दिल्ली की जनसंख्या या फिर कहें जनता को कोसने लगते हैं।आज दिल्ली का परिदृश्य कम से कम डेमोग्राफी के मामले में पूरी तरह से बदल गया है। यह फर्क पिछले एक दशक में बहुत तेजी से आया है। आज दिल्ली में उत्तर प्रदेश, बिहार, पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा मध्य भारत, उत्तरांचल, बंगाल आदि राज्यों से लाखों की संख्या में युवा आकर बस गए हैं। दिल्ली आज कॉस्मोपोलिटन का पूरा रूप ले चुकी है। भाजपा की हवा तो तब निकल गई जब 8 दिसंबर को हुए मतगणना में दिल्ली की जनता ने यह बता दिया की खाली थोथे वादे से जनता साथ नहीं चलती, उसे विकास का नारा ही नहीं, विकास कार्य देखने में ज्यादा रुचि है।दिल्ली की जनता को कोटि-कोटि नमन किया जाना चाहिए, जिसने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मेरी निगाह में पहली बार लोकतंत्र की जीत कराई है। सभी चुनाव विश्लेषक हों या समाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाला सामाजिक कार्यकर्ता आज वह महसूस कर रहा है कि भारत में वाकई में लोकतंत्र काफी सुदृढ़ हो चुका है। इतना ही नहीं यह उन सभी तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों के मुंह पर तमाचा भी है, जो अब तक यह कहते चले आ रहे हैं कि देश में लोकतंत्र की आवश्यकता नहीं है। देश को फौज के हवाले कर देना चाहिए, नेताओं को गोली मार देनी चाहिए और जाने क्या-क्या...।जहां तक बात राजस्थान की है तो यह सत्य है कि विश्लेषकों की भले न चली हो, लेकिन दावा करना और यह लिख देना कि वसुंधरा को राजस्थान में नकार दिया गया है बिल्कुल गलत है। कारण साफ है, राजस्थान में कांग्रेस ने 96 सीटों पर परचम लहराया, तो भाजपा भी 78 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी है। कहीं से भी यह आंकड़ा यह साबित नहीं करता कि भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया है या फिर एक संपादक की नजर में 'वसुंधरा राजे को पूरी तरह ठुकरा दिया है'। राजनीति में सभी की महत्वकांक्षाएं होती हैं और सभी विश्लेषक तथा राजनीति के जानकार जानते हैं कि राजस्थान दिल्ली नहीं और राजनीति की गणित इतनी सरल व साध्य नहीं है।जहां तक मध्य प्रदेश की बात है तो सबसे बड़ा राजनीतिक सत्य जो सामने आया है वह भारतीय जनशक्ति पार्टी की प्रमुख और राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं उमा भारती की हार है। शिवराज सिंह चौहान को कमजोर समझ कांग्रेस पार्टी पूरी तरह जीत के लिए ठीक उसी प्रकार आश्वस्त थी, जैसे भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में अपनी जीत के प्रति। कांग्रेस को वहां और छत्तीसगढ़ में मुंह की खानी पड़ी। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने भी अपनी कुर्सी बरकरार रखी।इन छह राज्यों (जम्मू-कश्मीर को लेकर) के चुनावों को लोकसभा का सेमीफाइनल समझा जा रहा है। इससे यह बात तो साबित हो जाती है इन चुनावों के में उठे मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति में भी असर डालेंगे। यह जरूरी है कि राष्ट्र के सम्मुख इस समय महंगाई और आतंकवाद दो महत्वपूर्ण समस्याएं हैं, जिनका जल्द और स्थायी इलाज आवश्यक है। जहां तक आतंकवाद का सवाल है, कोई राष्ट्रभक्त इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि इस समस्या पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। देश एक है राजनेताओं को भी एक होकर इसके निराकरण के लिए कदम उठाना चाहिए।जहां तक महंगाई की बात है तो इस बात को हम कैसे नकार सकते हैं कि भारत में मंदी का असर उतना नहीं है, जितना कि अन्य देशों में देखा जा रहा है। जहां तक महंगाई का सवाल है, तो जो लोग इसे अमेरिका की मंदी से आई बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं या फिर इस राजनीति में अपनी जवाबदेही से बचना चाहते हैं उनके लिए कुछ सवाल हैं- जैसे मंदी एक दिन का असर नहीं, जानकार और देश-विदेश का दौरा करने वाले अर्थ मामलों के जानकार आखिर क्या कर रहे थे। क्या मंदी और महंगाई की समस्या को एक साथ खड़ा करके लोगों को भ्रमित नहीं कर दिया गया है। मंदी से दाम गिरने चाहिए, महंगाई कम होनी चाहिए, क्या यह हुआ, अगर नहीं तो क्यों?भारतीय जनता पार्टी को 1999 के चुनाव में कांग्रेस ने प्याज के आंसू रुलाया और सत्ता पर यूं काबिज हुई कि भाजपा का भविष्य दिल्ली में खतरे में पड़ता नजर आने लगा। तो क्या आम आदमी की जेब का ख्याल नहीं किया जा सकता है? क्या आम आदमी से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा नहीं होने चाहिए? हुए भी तो क्यों जनता साथ नहीं गई? कारण यह भी है कि सिर्फ बोल से काम नहीं चलने वाला, इस मुद्दे पर लोगों के बीच जाने वाले दलों को यह बताना ही होगा कि विकास के साथ-साथ उनके पास क्या योजनाएं हैं कि वे महंगाई पर अंकुश लगाएंगे और लोगों को मंदी की मार से निजात दिलाएंगे।सभी पार्टियों के भीतर आज आत्ममंथन जारी है। परिणाम अप्रत्याशित हैं, इसलिए रणनीतिकारों को आगामी लोकसभा चुनावों के लिए जल्द ही नई पहल करनी पड़ेगी। यह पहल अब इसलिए जरूरी है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यह उदाहरण रख दिया है कि हम वाकई में लोकतांत्रिक सरकारें चुनने लगे हैं।

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