Tuesday, December 9, 2008

महंगे खिलौने तो हैं पर किताबें नहीं : डॉ. मालवीय

बाल साहित्य के क्षेत्र में दर्जनों पुस्तकों से अपना एक मुकाम बना चुके डॉ. विनय कुमार मालवीय ने प्रयाग की परम्परा को कायम रखते हुए साहित्य में अपनी रुचि के अनुरूप अब तक एक दर्जन से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इनमें बाल साहित्य से जुड़ी पुस्तकें सर्वाधिक हैं। डॉ. मालवीय की अब तक बाल साहित्य पर आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। चार अन्य पुस्तकें प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। इसके अलावा डॉ. मालवीय द्वारा सृजित कविताओं का संग्रह 'देश पर कुर्बान' भी छप चुका है। डॉ. मालवीय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी का संकलन भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं, डॉ. मालवीय को उनकी विलक्षण प्रतिभा के लिए विभिन्न सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा दो दर्जन से भी अधिक साहित्य सम्मान पुरस्कारों से विभूषित किया जा चुका है। डॉ. मालवीय की बाल साहित्य पर पकड़ को इस बात से भी समझा जा सकता है कि उनके द्वारा तैयार साहित्य पर आधा दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों में लघु शोध और दो विश्वविद्यालयों में पूर्ण शोध कार्य किया जा चुका है। तीन विश्वविद्यालयों द्वारा डॉ. मालवीय को मानद उपाधि भी प्रदान की जा चुकी हैं। मालवीय को हापुड़, पीलीभीत, मुरादाबाद, लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बस्ती, बलिया, वृंदावन, प्रतापगढ़, सीतापुर आदि जनपदों की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित भी किया गया है। साथ ही ख्यातिलब्ध संस्थानों द्वारा 'बालश्री', 'साहित्य श्री' एवं 'साहित्य शिरोमणि' की मानद उपाधियां भी प्रदान की गई हैं। बालदिवस के मौके पर प्रस्तुत है उनसे की गई बातचीत...
आपको बाल साहित्य की प्रेरणा कहां से मिली?
बचपन में जब मैं बच्चों की कहानी की किताबों को पढ़ा करता था तब मन में यह लालसा होती थी कि अगर कभी मेरी भी कहानी, कविता किसी पत्रिका में छपे तो अच्छा लगेगा। संयोगवश वर्ष 1982 में 'लोट-पोट' में मेरी एक कहानी प्रकाशित हो गई। बस तबसे उससे प्रेरित होकर मैं बाल साहित्य लिख रहा हूं। प्रेरणा मुझे सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार प्रेम नारायण जी गौड़ से प्राप्त हुई।
बाल साहित्य उपेक्षित क्यों है?
मेरे विचार से इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि बाल साहित्य को लोग दोयम दर्जे का साहित्य समझते हैं और इसको महत्व नहीं देते। दूसरा, अभिभावकों की उदासीनता। बच्चों को आप महंगे-महंगे खिलौने तो दिला देते हैं परंतु बाल साहित्य की एक पत्रिका अपनी इच्छा से नहीं दिलाते जबकि खिलौने के मूल्य से पुस्तक या पत्रिका का मूल्य कम होता है। अगर माता-पिता या अभिभावक महीने में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक अपने बच्चों को दिला दें तो इससे उनमें पढ़ने की इच्छा जागृत होगी जो उनके मानसिक विकास में सहायक सिद्ध होगी।
आजकल बाल नाटक क्यों नहीं लिखे जा रहे हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है कि बाल नाटकों का लिखना बंद हो गया है। बाल नाटक कम लिखे जा रहे हैं। जहां तक मैं समझता हूं कि इसका एक कारण यह है कि बाल नाटकों का प्रकाशन कम होता है। प्रत्येक रचनाकार जब कोई रचना लिखता है तो उसे किसी पत्रिका में भी प्रकाशित कराना चाहता है। बाल कहानियों एवं कविताएं तो लगभग प्रत्येक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं, परंतु बाल नाटकों को कम ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान दिया जाता है। जब बाल नाटकों को पत्र-पत्रिकाओं में स्थान ही नहीं दिया जाएगा तो लेखन अपने श्रम एवं समय दोनों को नाटक लिखने में खर्च करने के बजाय कहानी, कविता लिखना अधिक श्रेयष्कर समझेंगे। फिर भी आज कुछ साहित्यकार अच्छे रोचक एवं शिक्षाप्रद बाल नाटक लिख रहे हैं।
प्रकाशकों की क्या स्थिति है?
बाल साहित्य की काफी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। प्रकाशक तो व्यावसायिक होते हैं। वे अच्छी पुस्तकें प्रकाशित करना चाहते हैं। अच्छी पुस्तकों के प्रकाशन से उनका भी नाम होता है। लगभग सभी प्रकाशक बाल साहित्य की आकर्षक एवं सुंदर पुस्तकें पर्याप्त मात्रा में प्रकाशित कर रहे हैं।
आज बच्चे पुस्तकों से दूर क्यों होते जा रहे हैं?
नहीं ऐसा नहीं है। बच्चों को पुस्तक पढ़ने के लिए अब समय ही कम मिलता है। आप देखिए, सुबह उठना, स्कूल जाना, वहां से आने के बाद फिर कोचिंग चले जाना या घर पर ट्यूशन पढ़ना, इसके बाद स्कूल से मिले होमवर्क को पूरा करना। अब आप बताइए कि बच्चों के पास कितना समय बचा। फिर भी कुछ बच्चे अवकाश के दिनों में बाल साहित्य की पत्रिकाओं को रुचिपूर्वक पढ़ते हैं।
बाल पत्रिकाएं बंद क्यों हो रही हैं?
बाल पत्रिकाएं ही बंद हो रही हैं, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। प्रौढ़, वयस्क साहित्य की पत्रिकाओं का प्रकाशन भी प्रभावित हुआ है। आप देखिए, एक समय की बहुचर्चित एवं लोकप्रिय पत्रिकाएं- धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका बंद हो गईं जबकि उनका प्रचार-प्रसार भी काफी था। इसी प्रकार, बाल साहित्य की भी कुछ पत्रिकाएं- जैसे बालक, पराग आदि बंद हो गई। लेकिन, इसके बावजूद भी बाल साहित्य की कई पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं, जो बच्चों में काफी लोकप्रिय हैं। यह अपने आप में एक अच्छी बात है। इनमें चंदामामा, नंदन, लोटपोट, चंपक, सुमन सौरभ, बाल भारती, बालहंस आदि प्रमुख पत्रिकाएं हैं।
बाल साहित्य की दशा-दिशा के बारे में आपके क्या विचार हैं?
बाल साहित्य भी पाश्चात्य जगत की चकाचौंध से प्रभावित हुआ है। आवश्यकता इस बात की ही है कि बच्चों को यथार्थपरक रचनाएं उपलब्ध कराई जाएं जो उनके विकास में सहायक सिद्ध होगी। कपोलकल्पित और मनगढ़ंत कहानियों का बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर गलत प्रभाव पड़ता है।
आज लिखे जा रहे बाल साहित्य के बारे में आप कैसा सोचते हैं?
बाल साहित्य अच्छा एवं प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है। नए-नए कथानकों पर रचनाएं आ रही हैं। कविताएं भी नए-नए विषयों पर आधारित होती हैं। कहानियां, शिक्षाप्रद एवं प्रेरक तथा ज्ञानवर्धक होती हैं। ज्ञान-विज्ञान से संबंधित बाल कहानियां भी प्रकाशित हो रही हैं लेकिन बाल नाटक एवं हास्य बाल कहानियां कम देखने को मिल रही हैं।
आपकी दृष्टि में बच्चों की सृजनात्मक शक्ति का विकास किस प्रकार किया जा सकता है?
चरित्र निर्माण से बच्चों में सृजनात्मक शक्ति का विकास होता है और उसी के द्वारा उनमें करुणा, दया, क्षमा, सहनशीलता, बड़ों की प्रति आदर जैसे गुणों का विकास होता है। अत: बच्चों को ऐसा साहित्य उपलब्ध कराना चाहिए जिसे पढ़कर उनमें साहस एवं वीर बनने की भावना जाग्रत हो सके।

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