Saturday, July 10, 2010

उलझा परेशान मन

कुछ बुझा, अबूझ जीवन का यक्ष प्रश्न,
तंग गली, अंधकार भविष्य की उलझन,
चाह आगे बढ़ने की और मार्ग अवरुद्ध,
कैसे आगे बढ़ें, मार-काट, राजनीति,
सुबह से शाम, बस ऐसा मस्तिष्क में,
बस, अब और नहीं, जाए कहां, क्या करें,
सब हो जाए संतुष्ट
खोज़ में उलझ-उलझ उलझा मन।

2 comments:

Pramod Joshi said...

सब संतुष्ट कभी नहीं होंगे। मन का उलझना अच्छा है, पर उससे बेहतर है समाधानों का निकलना। एक रास्ता खुलता है तो सौ भटकावों का दर्द कम हो जाता है।

maan meri baat said...

धन्यवाद सर,
आज कई दिनों जब पुन: आपकी टिप्पणी को पढ़ा तो इस टिप्पणी के कई और मायने समझ में आए। और आगे बढ़ने की उम्मीद की किरण फिर जागृत हुई। इसके लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद...