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Sunday, October 24, 2010

कॉमनवेल्थ खेलों के घोटाले पर राजनीति ध्यान बांटने की साजिश

जिस घोटाले की जांच का पूरा देश इंतजार कर रहा था देर-सबेर प्रधानमंत्री ने स्वीकारा। चलो कॉमनवेल्थ खेल खत्म होने का इंतजार किया। ठीक किया, किंतु यह जांच सिर्फ यदि राजनीतिक लाभ लेने के लिए की जा रही है तो देश के तमाम आयकर दाताओं के पैसों का फिर नाजायज खर्च होना तय दिखाई जान पड़ रहा है।

खेल खत्म होने के साथ ही जिस प्रकार से खेलों की तैयारी में हुए भ्रष्टाचार की जांच के नाम पर राजनीति शुरू हुई है उससे तो यह स्पष्ट हो रहा है कि यह सब कवायद देश की तमाम नासमझ जनता को मूर्ख बनाकर भ्रमित करने की योजना है। जिस हिसाब से खेल आयोजन समिति और उससे जुड़े अधिकारी अपने पदों पर बरकरार रहकर जांच में सहयोग की बात कह रहे हैं वह यह साफ साबित कर रहा है कि जांच की कोई दिशा नहीं है और न ही जांच का कोई ठोस परिणाम निकलने वाला है।कॉमनवेल्थ खेलों पर जांच का सिलसिला शुरू हो चुका है। साथ ही आरंभ हो चुकी चिरपरिचित भारतीय राजनीति। चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत फिर चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। महीनों पहले कॉमवेल्थ आयोजन को लेकर घोटालों के विरोध में मीडिया की सक्रियता से रिपोर्टों को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत किया। मीडिया जितना सक्रिय था उतना ही निष्क्रिय भारतीय राजनीतिज्ञ और प्रशासन। आज तक किसी एक के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। हुआ वही, जो अब तक होता आया है। आरोप-प्रत्यारोप।सोमवार को भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पुणे में बयान दिया था कि वह मंगलवार को दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़े घोटालों पर पर्दाफाश करेंगे। इस बयान का नतीजा भाजपा को अपने ही नेता और ठेकेदार सुधांशु मित्तल के घर आयकर विभाग के छापा से भुगतना पड़ा। छापे की कार्रवाई करीब 25 लोगों के घर की गई किंतु मीडिया में नाम सिर्फ भाजपा नेता का ही उजागर हुआ। भाजपा नेता घोटाले में संलिप्त हैं या नहीं कोई नहीं कह सकता, यह जांच का विषय है। किंतु यह आभास होता है कि यह पूरी कार्रवाई सिर्फ गडकरी की जुबान पर ताला लगाने की एक कोशिश मात्र दिख रही थी।

Monday, September 27, 2010

Desire of a heart दिल की ख़्वाहिशें

आज फिर कुछ कहने को मन करता है,
दिल जवान हुआ है, कुछ करने को मन करता है
तुम पास नहीं तो क्या, मन आज उड़ने को करता है
हर एक सांस में तुमको भर लेने मन को करता है
आज फिर कुछ कहने को मन करता है।
तुमसे मिले अरसा बीत गया है,
चाहत कुछ और ज्यादा करने को जी करता है।
आज भी बंधन वही पुराना सा लगता है
वही सुबह, वही शाम तुम्हारे साथ के पल,
खुशगवार जिंदगी का साथ सुहाना लगता है।
आज फिर कुछ कहने को मन करता है।

Wednesday, September 22, 2010

फौजियों की गुंडागर्दी के खिलाफ बुलंद करें आवाज़

हाल ही में एक परिचित ने अपनी तकलीफ सुनाई... आप भी जानें..
इलाहाबाद से पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में वह जनरल डिब्बे में दिल्ली आने के लिए घुसा। घुसते ही उसने पाया कि एक फौजी आराम से एक सीट पर कब्जा किए सो रहा है। इतना ही नहीं, उसके सामने लोग खड़े हैं और अपनी धौंस से वह सभी को डरा कर सीट पर कब्जा किए हुए था। ठीक उसी डिब्बे के बगल वाले जनरल कोच में भी फौजियों ने जबरन कब्जा कर रखा था। उस डिब्बे में किसी भी आम आदमी को घुसने नहीं दिया जा रहा है। उस कोच में भी सभी आराम से सो रहे थे। जहां तक इस कोच की बात थी,, जब मित्र ने फौजी का विरोध किया था कि कुछ और फौजी डिब्बे में फौजी के नाम पर घुसे और सामने सीटों पर बैठे लोगों को उठवा दिया। मित्र ने इसका भी विरोध कर कहा कि यह फौजी डिब्बा नहीं है। पीछे वाले डिब्बे में फौजी पहले से ही घुसे हैं, उसमें चले जाओ, मित्र ने यह कहकर जैसे अपराध कर दिया। पांचों फौजी उस पर टूट पड़े। मित्र तो डिब्बे से उतर आया और उसने मुझे फोन लगाया। मेरी समझ में नहीं आया कि क्या करूं। हां इतना जरूर हैं कि मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि आखिर जब शांतिप्रिय क्षेत्र में सेना के सुशिक्षित, सुप्रशिक्षित और सभ्य जवान ऐसा बर्ताव करते हैं तो AFSPA जैसे कानून की आड़ में कश्मीर में क्या हालात होंगे। इसी स्थिति को मैं कश्मीर में एक व्यथित के बयान (जो एनडीटीवी की नीता शर्मा की हाल की कश्मीर पर की गई रिपोर्ट से बता रहा हूं) में कहा, कि बच्चे पढ़ने जाते हैं तो ये फौजी आई कार्ड मांगते हैं और उनका काफी समय हर जगह इसी काम में चला जाता है। यह कहते हुए वह कश्मीरी बोल पड़ा कि आखिर हमारे बच्चे क्यों कश्मीर में आई कार्ड दिखाएं, आई कार्ड तो इन बिहारियों को दिखाना चाहिए। उसकी जुबान में नफरत साफ दिखाई दे रही थी। फौजियों की बदसलूकी नई नहीं है। मैं, उमर अब्दुल्ला के शब्दों में कहूं तो इस(AFSPA) 'ड्रैकोनियन लॉ' का विरोध करता हूं। आप किस तरफ हैं...

Wednesday, July 21, 2010

आत्महत्या : घरवाले बन गए दुनियावाले

आज फिर कोई तनहा सिसक रहा होगा
दुनिया से नजर बचा रहा होगा,
तकिये में मुंह छुपा आंसू बहा रहा होगा,
चीखना चाहता होगा, चीख न रहा होगा।
हो गए हैं बाकी सब मस्त,
नहीं देख रहें हैं कि वो है पस्त,
अब घरवाले दुनियावाले बन गए हैं।
करीब के रिश्ते दूर के हो गए हैं।
भाई बहन दोस्त यार मतलब के हो गए हैं।
हंसे, इठलाए होंगे, दर्द कोई बांट नहीं रहा होगा।
चारों ओर से अकेलापन साल रहा होगा।
जीवन में आगे अंधकार नज़र आ रहा होगा।
कोई चारा बाकी नज़र नहीं आ रहा होगा।
जीवन के हर पहलू में हारा तड़प रहा होगा।
रास्ता कोई सूझ रहा न होगा...
हर एक सांस एक बोझ बन गया होगा।
जिन्दगी की लड़ाई हार गया होगा।

Saturday, July 10, 2010

कहीं 'बेवफाई' का इल्ज़ाम न लग जाए इन पर...

भोपाल गैस त्रासदी की घटना को 25 बरस ज्यादा हो रहे हैं और आज भी यह तय नहीं हो पा रहा कि आखिर मानव इतिहास में हजारों लोगों का नरसंहार और लाखों को पीड़ित अवस्था में छोड़ने वाली इस औद्योगिक आपदा का जिम्मेदार कौन है? भारतीय न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियां एक बार फिर कठघरे में हैं और उनकी कार्यप्रणाली का खोखलापन भी उजागर हुआ है। साथ ही राज्य व केंद्र सरकारों का रवैया भी सजग देशवासियों को साल रहा है। वहीं, इस मामले में अब तक की प्रगति यह साबित करती है कि सत्ताधारियों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह जो चाहे कर सकते हैं और जनता सिसकने, मूकदर्शक बने रहने तथा सशक्त पर्याय उपलब्ध न होने कारण अलावा कुछ नहीं कर सका।
कुछ दिनों पूर्व तक भोपाल का मामला मानों सिर्फ मुआवजे की लड़ाई, नई दिल्ली तथा भोपाल में छिटपुट प्रदर्शन के अलावा कुछ नहीं जान पड़ रहा था। अब राजनीति के दिग्गजों को आरोप-प्रत्यारोप का मौका मिल गया है और इसी के साथ दौर शुरू हुआ है अपनी पुरानी रंजिश का हिसाब चुकता करने का। एक-दूसरे पर 'लालची' (पद के दुरुपयोग) होने तक के आरोप बेखौफ लगाए जा रहे हैं। अब तक के पूरे घटनाक्रम पर नज़र दौड़ाई जाए तो यह बात साफ प्रतीत होती है कि कोई न कोई दोषी है और मामले में भीतर की बात के ख़बरी उन लोगों का नाम भी जानते हैं और उसे पहचानते भी हैं लेकिन राजनीति के ये दिग्गज अपने ऊपर 'बेवफाई' का इल्ज़ाम नहीं लगवाना चाहते।
23 साल से मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में चल रहे प्रकरण पर सोमवार सात जून को फैसला आया। इस घटना के लिए अदालत ने कुल आठ लोगों को इसका दोषी माना। अदालत ने इस मामले में सभी आठ आरोपियों केशव महिंद्रा, विजय गोखले, किशोर कामदार, जे मुकुंद, एसपी चौधरी, केबी शेट्टी, एसवाई कुरैशी और यूनियन कार्बाइड इंडिया को 304 (ए) के तहत दोषी करार दिया। इस फैसले में सात आरोपियों को दो-दो साल की कैद और एक-एक लाख रुपये के जुर्माने के साथ ही कंपनी यूनियन कार्बाइड इंडिया पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
भोपाल गैस कांड के बाद एंडरसन को गिरफ्तार किया गया था लेकिन उसे सिर्फ 25 हज़ार के मुचलके पर ज़मानत मिल गई। इसके बाद वह अमेरिका भाग गया। भोपाल गैस त्रासदी मामले की सुनवाई करने वाली अदालत ने यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को भगोड़ा घोषित कर दिया है।अदालत ने भगोड़ा घोषित कर दिया और तब की राजीव गांधी की केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश की अर्जुन सरकार के रवैये से अब यह कयास लगाए जाने लग गये हैं कि एंडरसन भागा नहीं था उसे सुरक्षित वापस भेजा गया था। यानि 20 हजार से भी ज्यादा लोगों की जानें लेने वाला हत्यारा और लाखों को किसी न किसी रूप में अपाहिज बनाने वाला एंडरसन 'निर्दोष' था। विदेशी चैनल को ठीक यूनियन कार्बाइड के सामने खड़ा होकर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने कहा कि उनका इरादा किसी को प्रोसिक्यूट करने या परेशान करने का नहीं है इसलिए उन्होंने एंडरसन को जमानत दे दी। वहीं, सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक लाल, जो इस मामले की जांच के प्रभारी थे, ने दावा किया कि उन पर विदेश मंत्रालय की ओर से एंडरसन के प्रत्यर्पण का प्रयास नहीं करने का दबाव था। अप्रैल 1994 से जुलाई 1995 के बीच मामले की जांच करने वाले लाल ने कहा, ‘‘सीबीआई की जांच प्रभावित की गई और कई अधिकारी इसे निर्देशित करते थे, जिसके परिणामस्वरूप भोपाल गैस त्रासदी मामले में न्याय में देरी हुई, और इस तरह न्याय नहीं मिल पाया।’’वहीं, सीबीआई के पूर्व उप-प्रमुख बीआर लाल के दावों को खारिज करते हुए विभाग के पूर्व निदेशक के विजयरामा राव ने कहा, ‘‘भारत सरकार और सीबीआई ने एंडरसन को अमेरिका से प्रत्यर्पित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन अमेरिका से इसके लिए मंजूरी नहीं मिली।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उनका (अमेरिका का) दावा था कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री सिर्फ एक सहायक कंपनी थी और इस व्यक्ति (एंडरसन) को सीधे तौर पर इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कंपनी के संचालन में वह सीधे शामिल नहीं थे। हालांकि हम उन्हें नैतिक तौर पर जिम्मेदार मान सकते हैं।’’एंडरसन की फरारी के मामले में पहली बार राजीव गांधी के प्रमुख सचिव रहे पीसी अलेक्जेंडर ने मुंह खोला और कहा कि उन्हें नहीं मालूम लेकिन उनका खयाल है कि अर्जुन ने राजीव से बात किए बिना कुछ नहीं किया होगा।
अलेक्जेंडर के इस बयान के बाद राजीव गांधी के सचिव रहे आरके धवन जैसे भड़क ही गए। उन्होंने अलेक्जेंडर पर नया आरोप ही मढ़ डाला। यह आरोप कहीं न कहीं देश की छिपी राजनीतिक गतिविधियों का खुलासा भी करता है। आरके धवन ने आरोप लगाया कि अलेक्ज़ेंडर को राष्ट्रपति नहीं बनने दिया गया था इसलिए वे नाराज हैं और इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। कह सकते हैं कि भोपाल कांड ने सबको टांग खिंचाई करने का मौका दे दिया और जनता को यह जानने का मौका मिल गया कि कौन कितने पानी में है?
इस पूरे मामले में एक बात और भी कही जा रही है वह यह कि 1984 में भागने से पहले एंडरसन ने तब के राष्ट्रपति जैल सिंह से मुलाक़ात की। लेकिन उस दौरान ज्ञानी ज़ैल सिंह के प्रेस सचिव तरलोचन सिंह ने इससे साफ़ इनकार किया है।जैल सिंह के प्रेस सचिव तरलोचन सिंह ने कहा कि उन्हें एंडरसन और ज़ैल सिंह की मीटिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं है। तरलोचन सिंह ने यह भी कहा कि कोई भी विदेशी एक दो दिन की मोहलत के बिना राष्ट्रपति से नहीं मिल सकता था। जब तक विदेश मंत्रालय या संबंधित मंत्रालय की मंजूरी ना हो।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री वसंत साठे ने भोपाल गैस त्रासदी मामले में यहां तक कह डाला कि 1984 में सरकार में कुछ ‘शरारती’ तत्व शामिल थे, जिन्होंने यूनियन कार्बाइड के सीईओ वॉरेन एंडरसन को देश से भगाने में मदद की थी। साठे ने कहा, ‘‘यह एक गलती थी (एंडरसन को भारत से भागने की अनुमति देना)।’’ उन्होंने कहा, ‘‘एंडरसन की रिहाई पूरी तरह गलत और अवैध थी। भारत से बाहर जाने में उसकी मदद किसी प्राधिकारी द्वारा की गई थी, लेकिन मैं किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं लगा सकता।’’तब की सरकार में दिग्विजय सिंह मंत्री थे। उनका कहना है कि हो सकता है कि यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वॉरेन एंडरसन को अमेरिका के दबाव में छोड़ दिया गया हो। कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी तो कांग्रेस पार्टी को ही परोक्ष रूप में दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती। उन्होंने कि उस वक्त केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकारें थीं और एंडरसन बच निकलने में कामयाब रहा।
सीबीआई की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना भी लाज़मी है। कोर्ट में एंडरसन की पेशी की बात पर सीबीआई हमेशा कहती रही कि उसे एंडरसन के ठौर-ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं है। इसके विपरीत ग्रीनपीस नाम की संस्था के पॉलिटिकल एसेट्स एडवाइजर और जनसंपर्क अधिकारी निर्मला करुणन ने बताया, ‘हमने देखा कि हमारे पहुंचने के बाद वॉरेन एंडरसन पीछे के दरवाजे से भाग गया।’ उन्होंने बताया, ‘हमने पूरी घटना के बारे में इसके फौरन बाद अमेरिकी अदालत, सीबीआई और भारत की अदालत को भी बताया।’ भोपाल गैस त्रासदी मामले की सुनवाई करने वाली अदालत ने भले ही यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को भगोड़ा घोषित कर दिया हो, लेकिन जानी मानी पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस ने एंडरसन को न केवल आंखों से देखा, बल्कि उसके बारे में सीबीआई और अदालत को सूचित भी किया था।इस घटना में सबसे बड़ा दोषी यूनियन कॉर्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन है। उसने कभी खुद को जिम्मेदार या गुनहगार माना हो ऐसा लगता नहीं। भोपाल हादसे के महज 3 महीने बाद एक टीवी इंटरव्यू में एंडरसन ने साफ तौर पर कहा कि हादसे के लिए कारखाने के कामगार जिम्मेदार हैं वो नहीं। वारेन एंडरसन ने इस इंटरव्यू में कहा, 'सुरक्षा उन लोगों की जिम्मेदारी है जो हमारे कारखानों में काम करते हैं और इस तरह की व्यवस्था में आप उनको जिम्मेदारी से बरी कर किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते।'कुछ ऐसे सबूत हैं जिसे कभी भी झुठलाया नहीं जा सकता। उस दौरान का एक टैलेक्स बताता है कि यूनियन कॉर्बाइड ने अपने भोपाल कारखाने में सुरक्षा की कैसी अनदेखी की। 27 अगस्त 1984 को यानी हादसे से 3 महीने पहले ये टैलेक्स कारखाने के वर्क्स मैनेजर जे मुकुंद ने अमेरिका भेजा था। यूनियन कार्बाइड की सेफ्टी टीम के अफसर सी टायसन से उन्होंने भोपाल प्लांट की पाइपिंग को मजबूत करने के लिए सुझाव मांगे। ये भी बताया कि वो पूरे प्लांट में एस्बैस्टस को फिलर मेटेरियल बनाना चाहते हैं। मुकुंद को 12 सितंबर 1984 को जवाब आया। सी टायससन ने लिखा कि उनके हिसाब से सबसे बढ़िया फिलर मटेरियल ग्रेफॉयल (grafoil) है। अमेरिकी प्लांट में इसका टेस्ट किया गया है। लेकिन भोपाल के प्लांट के लिए ये महंगा हो सकता है। इसी बात से समझ लीजिए की प्लांट में सुरक्षा को लेकर कितनी लापरवाही बरती गई।हादसे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तब साफ कहा कि हादसे की जिम्मेदारी यूनियन कार्बाइड की है। हादसे की जांच कर सीबीआई ने कोर्ट को बताया था कि कारखाने की डिजाइन गड़बड़ थी और उसको चलाने में भी लापरवाही की जा रही थी और ये दोनों यूनियन कार्बाइड की जिम्मेदारी है।
भारत में एंडरसन पर फैसला आया तो गूंज अमेरिका में भी सुनाई दी। यूनियन कार्बाइड कंपनी के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई किए जाने की मांग को अमेरिका ने सिरे से खारिज कर दिया। अमेरिका के उप विदेश मंत्री रॉबर्ट ब्लेक ने कहा, 'भोपाल गैस कांड इतिहास का सबसे बड़ा औद्योगिक हादसा था लेकिन मुझे नहीं लगता कि फैसले के बाद कोई नई जांच शुरू होगी। हमें उम्मीद है कि इस फ़ैसले के बाद पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए ये मामला खत्म होगा।'वैसे केंद्रीय विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने तसल्ली देने के लिए कह भर दिया है कि भोपाल गैस त्रासदी के मामले में यूनियन कार्बाइड के पूर्व प्रमुख वारेन एंडरसन के खिलाफ मामला बंद नहीं हुआ है। मंत्री ने कहा, ‘सीबीआई ने आरोप-पत्र दाखिल किया है। इसके बाद अदालतों ने आरोप तय किए। वह फरार है और उसे भगोड़ा अपराधी घोषित किया गया है।’ मोइली ने कहा, ‘इसका मतलब यह नहीं है कि उसके खिलाफ मामला बंद हो गया।’ भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालत के फैसले की समीक्षा, और इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पांच सदस्यीय समिति गठित की है। यह समिति 10 दिनों में प्रारंभिक रिपोर्ट देगी और 30 दिन के अंदर अदालत के फैसले को चुनौती देने पर विचार करेगी। ताजा ख़बर यह भी है कि केंद्र सरकार ने एंडरसन की सुरक्षित वापसी का वादा तक अमेरिका से किया था। एंडरसन के पकड़े जाने पर अमेरिकी दूतावास के अधिकारी ने भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से बात की थी और उन्होंने वादा पूरा करने की बात कही थी और यह हुआ भी। फिर क्या राजीव गांधी लोगों के सामने इंटरव्यू में कार्रवाई किए जाने और यूनियन कार्बाइड को दोषी ठहराने का दिखावा कर रहे थे।प्रश्न यह है कि आखिर कब देश में देशभक्त राजनेता आएगा। अब तक के ये नेता निहितस्वार्थ से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। दिन प्रतिदिन हो रहे नए खुलासों से वैश्विक पटल पर विश्व से सबसे बड़े लोकतंत्र के नेतृत्व और उनकी साख पर बट्टा ही लगा रही है।

Thursday, July 8, 2010

जनता के पैसों पर सरकारी ऐश का नज़ारा जारी

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को पेट्रोल की कीमत को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करते हुए डीजल, केरोसीन और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि की घोषणा की। अब पेट्रोल 3.50 रूपये प्रति लीटर, डीजल दो रूपये प्रति लीटर, केरोसीन तीन रूपये प्रति लीटर और रसोई गैस 35 रूपये प्रति सिलेंडर महंगे हो गए हैं। नई दरें शुक्रवार आधी रात से लागू हो गईं।राजनीतिक दलों को एक जाना पहचाना से मुद्दा मिल गया और शुरू हो गया चैनलों में इंटरव्यू, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें छपवाने और बयानबाजी करने का दौर। दिल्ली में भाजपा के नेताओं का ढोंग तो एक चैनल में साफ देखने को मिल गया। दिल्ली सरकार द्वारा लोगों के 'अवैध' मकान ढहाए जाने से नाराज़ लोग जहां विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए थे वहीं भाजपा नेता बीच में महंगाई के विरोध में एक पोस्टर लेकर कैमरे के सामने खड़े हो गए। बड़ी बेशर्मी और चालाकी के साथ जनता को मूर्ख बनाया जा रहा था। भीड़ में शामिल लोगों को तो यह भी आभास न था कि वे किसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। महंगाई के विरोध में या फिर मकान ढहाए जाने के विरोध में। राजनीतिक पार्टियों का स्तर इतना गिर जाएगा किसी ने सोचा नहीं होगा।दिल्ली में और देश के गैर-भाजपा शासित राज्यों में भाजपा के कार्यकर्ताओं ने चक्का जाम किया और प्रदर्शन किया। मेरठ के समीप ब्रिजपुर रेलवे स्टेशन पर भाजपा नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने किसानों के साथ मिलकर ट्रेन तक रोक दी। इससे इस महत्वपूर्ण मार्ग पर ट्रेनों का आवागमन दो घंटों तक बाधित रहा। वहीं, जनता इससे और परेशान हुई। भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन जैसे एक ढकोसला सा प्रतीत हुआ। सिर्फ टीवी कैमरों, फोटोग्राफरों और पत्रकारों को दिखाने के लिए रहा हो।पिछले दो सालों से सरकार लगातार महंगाई को कम करने का दावा कर रही है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, योजना आयोग के उपाध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक ने कई बार सुविचारित घोषणा की कि महंगाई अमुक महीने में नियंत्रित हो जाएगी। अर्थव्यवस्था घोषणाओं पर आधारित नहीं होती। शायद इसीलिए खाद्य मुद्रास्फीति की दर रुकने का नाम भी नहीं ले रही है। पिछले दो साल में ही चीनी दोगुने दाम पर पहुंच गई है। जहां तक पेट्रोल और डीजल की बात है तो मात्र एक वर्ष में ही सरकार ने चार बार कीमतें बढ़ाई हैं। इनकी कीमतों में 27 फीसदी से लेकर 30 फीसद तक की बढ़ोतरी की गई है। यानि यह साफ है कि सरकार का महंगाई से कोई लेना देना ही नहीं है। ईंधन के दाम में बढ़ोतरी से ट्रांस्पोर्ट का दाम बढ़ेगा। ट्रांस्पोर्टरों ने साफ तौर पर 15 फीसदी किराए में बढ़ाने की एकतरफा घोषणा कर दी है। इसका अर्थ साफ है कि महंगाई सीधे तौर पर 15 फीसद तो बढ़ ही जाएगी।अब एक नजर पिछले दो साल में महंगाई बढ़ने के कुछ अन्य आंकड़ों पर डालते हैं। खाद्य पदार्थ : 7.02% (वर्ष 2007 में) से 17.41% जनवरी 2010 में। खाद्य उत्पाद : 3.43% (वर्ष 2007 में) से 22.55% जनवरी 2010 में। खाद्य वस्तुएं: 5.60% (वर्ष 2007 में) से 19.42% जनवरी 2010 में। खाद्यान्न : 6.27% (वर्ष 2007 में) से 17.89% जनवरी 2010 में। अन्न : 6.27% (वर्ष 2007 में) से 13.69% जनवरी 2010 में। दालें : 2.14% (वर्ष 2007 में) से 45.62% जनवरी 2010 में। चावल : 6.05% (वर्ष 2007 में) से 12.02% जनवरी 2010 में। गेहूं : 6.77% (वर्ष 2007 में) से 14.86% जनवरी 2010 में। दुग्ध उत्पाद : 6.08% (वर्ष 2007 में) से 12.87% जनवरी 2010 में। अंडे, मछली और मीट : 6.38% (वर्ष 2007 में) से 30.71% जनवरी 2010 में। चीनी : (-)14.69% (वर्ष 2007 में) से 58.94% जनवरी 2010 में। छठे वेतन आयोग के लागू होने के बाद से सरकारी कर्मचारियों की मौज हो गई। उनकी तनख्वाह के साथ ही तमाम तरह की सरकारी सुविधाओं की गिनती नहीं है। उनका कोई मोल भी नहीं है। यह सब मौज उन करदाताओं की गाढ़ी कमाई पर हो रहा है जो इस महंगाई और मंदी की मार के वास्तविक वाहक है। वहीं निजी क्षेत्र में काम करने वालों के लिए तो पैकेज ही सबकुछ है। उसी में सारी सुविधाएं सम्मिलित होती है। आंकड़े को देखकर साफ है कि महंगाई का सर्वाधिक बोझ आम आदमी पर ही पड़ेगा। नौकरशाहों से लेकर तमाम सरकारी गाड़ियों में घूमने वालों का खर्चा तो सरकारी खजाने से आ ही जाएगा। मगर उनका क्या जिन्हें अपने पैकेज से ही इसका खर्चा उठाना पड़ेगा।पांच साल में 32 बार कीमतें बढ़ने का अर्थ है कि पेट्रोल और डीज़ल की कीमत अब दो गुना से ज़्यादा बढ़ गई हैं। वर्तमान पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा हमेशा से ही कीमतें बढ़ाने की वकालत करते आ रहे हैं। जब मौका मिला तपाक से कीमत बढ़ा दी। आज तेल के दाम बाजार पर सीधे निर्भर हो गए। सरकार ने अपना नियंत्रण पूरी तरह से हटा लिया है। ऐसे में देवड़ा साहब का मंदी के समय पत्रकारों को दिया जवाब याद आ रहा है। मंदी के समय जब तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत करीब 60 डॉलर प्रति बैरल पहुंची थी और भारत में तब भी उपभोक्ताओं से ज्यादा कीमत वसूली जा रही थी तब श्रीमान देवड़ा साहब कई दिनों तक मीडिया के सामने हंसने (रोने का काम तो अकसर करते रहते हैं) तक नहीं आए। आखिर मीडिया ने जब घेरकर इस बारे में जानकारी मांगी तब उनका कहना था कि सरकार घाटा पूर्ति कर रही है। आम आदमी और देश में गरीबों का इससे ज्यादा मजाक क्या उड़ाया जाएगा कि सरकार मंदी में भी त्राही-त्राही कर रही जनता की जेब से पैसा निकालने में पीछे नहीं रही। मंदी के दौर में लाखों युवकों (निजी क्षेत्र में) की नौकरी चली गई और लाखों के पैकेज में कटौती कर दी गई फिर भी सरकार का सार्वजनिक निकम्मापन बेशर्मी के साथ जारी है।ईंधन की कीमतों का सच यह है कि आधे से ज्यादा रुपया तो टैक्स के रूप में वसूला जाता है। आज पेट्रोल की वास्तविक कीमत 22-25 रुपये होनी चाहिए। वह आज 50-55 है क्योंकि सरकारी कर भारी मात्रा में है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है। यदि बाजार में तेल की कीमत 51.90 पैसा है तो वह इस कीमत पर कैसे पहुंचा। इसके ब्रेक अप पर एक नजर : तेल का मूल दाम - 21.93 रुपये। इस पर एक्साइज ड्यूटी लगी 14.35 पैसे। इसी के साथ इस पर एजूकेशन टैक्स लगा 0.43 रुपये। डीलर का कमीशन हुआ 1.05 रुपये। सरकारी वैट लगा 5.50 रुपये। क्रूड कस्टम ड्यूटी लगी 1.54 रुपये। ट्रांस्पोर्टेशन चार्ज लगा 6.00 रुपये। इन सब को मिलाकर एक लीटर पेट्रोल का दाम 51.90 पैसे हो गया। इस पूरे गुणा भाग से यह तो साबित हो जाता है कि पेट्रोल का जितना दाम है उतना ही सरकार का टैक्स इस पर लगता है।राजनीतिक बेशर्मी की एक बानगी यह भी। सरकार के घटक दल जो भीतर तो ईंधन बढ़ोतरी का समर्थन चुके हैं बाहर आकर घोषणा करते हैं कि हम इसके विरोध में हैं। खैर, ममता बनर्जी का दोमुंहापन भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। वह पहले भी ऐसा ही करती रही हैं। वैसे भी बंगाल में निकाय चुनाव से पूर्व ही सरकार इस निर्णय तक पहुंच गई थी किंतु चुनाव पर प्रतिकूल असर न पड़े इसके लिए ममता दीदी ने सरकार के भीतर ही ऐसा करने की मनाही कर दी थी। फिर अब क्या हुआ जो बाहर तो विरोध दिखा रही हैं और भीतर से सरकार को समर्थन जारी है। महंगाई पर हैदराबाद में भी प्रदर्शन हुआ और एक पार्टी के कई कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारियां भी दीं।आम आदमी की बात करने वाली सरकारी नुमाइंदे तो खास होते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला है कि हजारों में तनख्वाह पाने वाले चंद सालों में करोड़ों में खेलने लगते हैं। उन्हें खाने की तकलीफ कहां। वहीं, आम आदमी की रोटी महंगी होती जा रही है। थाली में पहले दाल की कटोरी छोटी हो गई। सब्जी की खपत कम करनी पड़ी। अब हाल दाल या फिर सब्जी पर आ गया है। महंगाई का आलम यह है कि बेफिक्री खर्चा करने वालों का भी बजट बिगड़ गया है। हास्यास्पद तो तब लगता है जब तमाम जनविरोधी मुद्दों पर कांग्रसनीत यूपीए गठबंधन की सरकार की मुख्य पार्टी कांग्रेस भी बकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर ऐसे गंभीर मसलों पर सरकार से इत्तेफाक नहीं रखने का राग अलापती हैं। शायद वह सही हैं कि जनता मूर्ख है और सरकारी निर्णय को कांग्रेस पार्टी का निर्णय नहीं मानेंगी। राजनीति, वोट बैंक का चक्कर इस हद तक गिर गया है कि आम आदमी का दर्द समझने की जरूरत तक महसूस नहीं होती। इसीलिये कहा गया है कि जाके पांव न फ़टी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। इस बार वाक्युद्ध में पीएम मनमोहन सिंह भी उतर आए हैं और साथ ही ईंधन की बढ़ाई गई कीमतों को न्यायोचित ठहरा रहे हैं। कह रहे हैं कि जनता सब समझती है। जी हां, कह सकते हैं कि जनता समझती है कि पीएम साहब को बाजार गए एक युग बीत चुका है।इस समय महंगाई की मार जनता पर देने के एक मायना और निकाला जा सकता है। भोपाल कांड में कांग्रेस कुछ इस तरह उलझती जा रही थी कि बचने का कोई रास्ता ही दिखाई नहीं दे रहा था। आरोप की सुई सीधे कांग्रेस के पूर्व वफादार और मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की घूमी ही साथ सीआईए की तब की रिपोर्ट ने केंद्र की सरकार पर भी इसका जिम्मेदारी डाल दी। हादसे के समय देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री हुआ करते थे साथ राजीव गांधी के पास विदेश मंत्रालय भी था। हादसे के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से एंडरसन की मुलाकात स्पष्ट नहीं है किंतु ज्ञानी जी के सचिव रहे तरलोचन सिंह का बयान कि विदेश मंत्रालय चाहता तो यह संभव था मामले को कुछ उलझा जरूर देता है। इतने गंभीर मसले से मीडिया को निकालने और देश की जनता का ध्यान बंटाने के लिए कहीं इतनी महंगाई तो नहीं कर दी गई है। अब हजारों की मौत और लाखों को जिंदा पीड़ित छोड़ने वाली घटना को लोग भूल जाएंगे और करोड़ों को एक साथ लील जाने वाले महंगाई के लिए त्राहीमाम-त्राहीमाम करने लगेंगे। संदेश साफ है लोग रोटी की जुगाड़ में व्यस्त हो जाएं, देश, समाज की चिंता छोड़ सरकार को अपना कामकाज मनमाने ढंग से आगे भी करने दें।

Monday, February 15, 2010

हर शिकायत पर दर्ज करनी होगी एफआईआर!

पुलिस अब प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने को लेकर आनाकानी नहीं कर सकेगी। इस संबंध में लोगों से मिल रही शिकायतों को देखते हुए गृह मंत्रालय अब इस पर विचार कर रहा है कि पुलिस में की गई हर शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज करनी होगी। एक आधिकारिक सूत्र ने कहा कि रुचिका गिरहोत्रा मामले के बाद इस पर विचार किया जा रहा है। रुचिका मामले में पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद भी हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौड़ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी की थी। रुचिका के परिवार के मुताबिक 1990 में जब वे राठौड़ के खिलाफ मामला दर्ज कराना चाहते थे तो पहले तो पुलिस ने मामला दर्ज करने से इंकार कर दिया। बाद में जब उसके भाई पर चोरी का झूठा इलजाम लगाया गया तो परिवार मामला दर्ज कराना चाहता था लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने से इंकार कर दिया। बताया जाता है कि दंड प्रक्रिया संहिता में प्रस्तावित संशोधन में सरकार थाना प्रभारी के लिए यह अनिवार्य करना चाहती है कि अगर वह कोई मामला दर्ज नहीं करता है तो इसका वह वाजिब कारण दें।

Sunday, February 7, 2010

राहुल के दौरे ने बढ़ाया शाहरुख का कद

राहुल गांधी का मुंबई का दौरा पूरा हो गया और यह भी साबित कर दिया गया कि शिव सेना का शेर बूढ़ा हो गया है और उसकी दहाड़ का असर भी फीका पड़ गया है। कांग्रेस पार्टी के युवराज का स्वागत और सुरक्षा का ऐसा इंतजाम था कि दशकों से मुंबई की सड़कों पर आतंक का नाम बन चुके शिव सैनिकों को आखिर पहाड़ के नीचे आना ही पड़ा। परिणाम साफ है कि एक समय जावेद मियांदाद की पाकिस्तान के साथ भारत में क्रिकेट खेलने देने की अनुमति (असंवैधानिक और गैर-सरकारी) का हक रखने वाले बाल ठाकरे और उनके कदमों पर चलने का प्रयास करने वाले पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं।

मुंबई के इतिहास में यह पहला अवसर है कि मराठीवाद का नारा बुलंद करने वाली पार्टी को शिकस्त खानी पड़ी है। इस में सबसे अहम बात यह है कि मरने मारने को तैयार मराठी का परचम लहराने वाले किसी भी शख्स का एक बूंद खून नहीं बहा। इतिहास गवाह है कि मुंबई (पहले के बॉम्बे) के गुजरात में शामिल किए जाने के मोरारजी देसाई के प्रयास के खिलाफ सम्युक्त महाराष्ट्र समिति की मुहिम में हजारों मराठी सड़कों पर उतर आए और 105 मराठियों ने अपना बलिदान भी दिया। मराठियों की नाराजगी को शांत करने के लिए एक मुख्यमंत्री को अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा और एक मराठा मुख्यमंत्री वाईबी चव्हाण की ताजपोशी भी हो गई। आज शिव सेना हार गई है और अब यह भी कह दिया है कि शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज़ खान की रिलीज और सिनेमाघरों में चलने देने में किसी भी प्रकार का कोई व्यवधान पैदा नहीं करेगी। यह स्थिति तब आई है जब कुछ दिनों पहले ही शाहरुख ने गला भरके फिल्म के प्रोड्यूसर करन जौहर और अभिनेत्री काजोल से माफी मांगी।

शाहरुख ने माफी नहीं मांगी और विदेश दौरे के बाद जब वो मुंबई में लौटे तो परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका था और जो शाहरुख न्यूयॉर्क में उतरे चेहरे के साथ साथियों से माफी मांग रहे थे, के चेहरे पर आत्म-विश्वास और जीत की चमक दिखी। सरकारी डंडे का इस्तेमाल कुछ इस तरह हो चुका था कि मुंबई में जिसकी दहाड़ सिनेमाघरों से फिल्म तो उतरवा देती थी और यहां तक की पोस्टर तक नहीं बचते थे से बात करने की शाहरुख ने बात कह दी। राहुल की मुंबई दौरे की धमक ने शाहरुख का कद बढ़ा दिया। जी हां, मुंबई में बाला साहब की बराबरी करना किसी भी दिग्गज के लिए सोचना भी बड़ी बात होती है। मगर, यह बॉलीवुड के बादशाह के लिए यह हकीकत बन गया है। इतनी बड़ी जीत के बाद भी शाहरुख कुछ तो डरे हुए हैं ही, जो यह भी कहते हैं कि यदि बातचीत का बुलावा आया तो वह मातोश्री जरूर जाएंगे।

राजनीतिक गलियारों में यह साफ तौर पर प्रश्न उठ रहा है कि आखिर हिन्दी बोलने के लिए दिया गया जया बच्चन और प्रियंका चोपड़ा का बयान कहां तक गलत था कि महाराष्ट्र का नवनिर्माण करने की विचारधारा लिए मनसे के निशाने पर बिग बी आ गए और हफ्तों पूरे भारत वर्ष के सामने बिग बी और परिवार की धज्जियां उड़ती रहीं और एक राहुल को बॉलीवुड का इतना भी मान रखना नहीं आया कि बिग बी के समर्थन में एक बयान देते। यह पूरा बॉलीवुड भी शांत था। तब किसी के मुंह से बॉलीवुड के शहंशाह के सहानुभूति का एक शब्द भी न आया। इनमें वो तमाम नाम शामिल है जो अपने को बादशाह, बाजीगर, वीर, शबाना, अगैरा-वगैरा आदि। दिल्ली की सियासत से जुड़े कई दिग्गजों ने भी जरूरत नहीं समझी कि इस मामले में कुछ कहते। कारण सबको पता है कि कभी गांधी परिवार के करीबी रहे बच्चन परिवार की करीबी समादवादी पार्टी हो गई थी। और सपा को राजनीतिक लाभ न मिल जाए इसलिए कानून और संविधान की मूल भावनाओं का खुलेआम कत्ल होता रहा है। इस बात से स्टार ऑफ दि मिलेनियम के खिताब से नवाजे जा चुके अमिताभ बच्चन को भी एहसास हो गया कि वह भी एक आम आदमी ही हैं और देश में किसी को खास भले ही जनता बनाती हो मगर जब कानून की बात आती है तो शासन प्रशासन से नजदीकियों के साथ किस राजनीतिक आका के आप करीबी हैं यह भी खास रहती है। अंतत: बिग बी ने सरे आम बयान के लिए माफी मांगी और तमाम तरह के प्रहारों को शांत किया। इतना काफी नहीं था कि अब बिग बी अपनी फिल्म को दिखाने के लिए मातोश्री भी जाने को तैयार रहते हैं। और तो और अब उनकी कंपनी मराठी में भी फिल्मों के प्रोडक्शन की तैयारी कर चुकी है।

मुंबई के संजय निरूपम जो अभी कुछ दिन पूर्व ही राहुल को काले झंडे दिखाने के बाला साहब के फरमान पर हाथों में चूड़ी न पहने होने की बात चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे तब कहां दुबक कर बैठ गए थे जब टीवी कैमरों के सामने मनसे के गुंडे बिहार-यूपी के लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर सड़कों पर पीट रहे थे। दूसरा अहम प्रश्न जो अब जब भी किसी कांग्रेसी नेता के सामने उठाया जाता है तो वह बगले झांकने लगते हैं कि आखिर जो सुरक्षा व्यवस्था राहुल गांधी के लिए की गई थी क्या वह एक परीक्षा के समय नहीं की जा सकती थी। पूरे महाराष्ट्र में यूपी-बिहार से आकर रह रहे मेहनतकश हजारों लोगों को सरेराह पीटा गया और सैकड़ों की बलि चढ़ा दी गई। लाशों के ढेर पर की गई यह राजनीति आने वाले में समय में सिख दंगों के दंश की तरह कांग्रेस पार्टी को सताती रहेगी। यहां उत्तर भारतीयों की सुरक्षा की गारंटी ठीक उसी प्रकार दी गई जैसे की बाबरी मस्जिद के विध्वंश के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने दी थी। कल्याण जानबूझकर फेल हुए और सीना ठोंक कर कहा कि वह इसके अंजाम के लिए तैयार हैं और अंजाम आज यह है कि राजनीति में शिखर पर रहे कल्याण आज हाशिए पर पहुंच गए हैं। कोई पार्टी उन्हें लेने को तैयार नहीं है।

टीवी मीडिया भले ही राहुल के बिहार दौरे की बहुत अच्छी और कुछ बुरी तस्वीरें ही प्रस्तुत कर पाया हो मगर यह भी बड़ा सच है कि कई स्थानों पर राहुल इस प्रश्न का जवाब नहीं दे पाए और लोगों के कोपभाजन का शिकार भी हुए।

जहां महाराष्ट्र की राजनीति का सवाल है बिना किसी अपवाद के यह जगजाहिर है कि मराठा कार्ड महाराष्ट्र की राजनीति का अहम हिस्सा है और एक भी पार्टी ऐसी नहीं जो यह कार्ड न खेलती हो। यह पहली बार हुआ है कि एक बाहरी (राहुल गांधी) जो मुंबई में आया हो औरकामयाबी से अपना काम करके चला गया। यह घटना देश की राजनीति पर दूरगामी असर डालेगी और साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में जल्द ही नए समीकरण का खुलासा भी करेगी।

Saturday, August 29, 2009

लालफीताशाही लेती जान और सब हैं अंजान

उत्तर प्रदेश में बलात्कार पर राजनीति और इस हद तक गिरी हुई राजनीति... देश के नागरिकों के लिए किसी शर्मिंदगी से कम नहीं। बात माया और रीता की है। आज हम समलैंगिकता जैसे सामाजिक मुद्दे पर भी चर्चा कर रहे हैं। सामाजिक बदलाव की चली बयार में जहां कोर्ट ने भी इस बात की किसी कोने में मंजूरी दे दी है मगर यह अफसोसजनक है कि गांधी जी के अंहिसात्मक आंदोलन की पृष्ठभूमि में तैयार लोकतांत्रिक प्रणाली का अनुसरण करने वाले देश में लोक और तंत्र अलग-थलग पड़ा दिखाई जान पड़ता है।दर्द यह है कि मात्र कुछ खद्दरधारी, वर्दीधारी, पदवीधारी और अधिकारी-कर्मचारी अपने निहित स्वार्थार्थ देश की तरक्की में बाधक बने हुए हैं। इन लोगों का ताना-बाना न्याय की आस लगाए लोगों को इतने दांव-पेंच में उलझा डालता है कि इससे आजिज आकर कहीं कोई आदमी वकील के चैंबर में ही खुद को बम लगाकर मार डालता है। इस तरह के अनगिनत उदाहरण हैं कि देश में लाखों मौत मात्र इन्हीं दांव-पेंचों की वजह से होती।
बड़ी बात कोई असर क्यों नहीं करती, यह उलझन रहती है। फिलहाल कारण साफ है कि अज्ञात आम आदमी हतोत्साहित, निरुत्साहित और प्रताड़ित हो अकेला महसूस करता है और उसका स्वाभिमान उसे जीने नहीं देता। इसके बाद ऐसे कदम को उठाने को मजबूर हो जाता है।
हाल की यह घटना आज मामूली है, किसी मीडिया वाले ने इस पर गौर नहीं किया। इस पर किसी ने चर्चा नहीं की। किसी के लिए यह मुद्दा नहीं बना। शायद टीआरपी नहीं होगी मगर भविष्य ऐसे ही माध्यम का होगा जो आम आदमी के भीतर प्रताड़ना से उबाल मार रहे गुबार को समझे और उसे सही मंच पर उठाकर आवाज दे। हो सके तो पत्रकारिता के सही मायनों को एक बार फिर संवेदनशील बनाकर जीवित करने की पहल की जाए। यह इसलिए भी जरूरी ताकि जीवन की भागदौड़ में मशगूल शहरी को संवेदनशील बनाकर उसे उसी के हक की लड़ाई लड़ने के लिए जागृत किया जा सके। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भविष्य में स्थिति का विस्फोटक होना तय जान पड़ता है।
कोई इस बात को समझने की कोई कोशिश नहीं कर रहा कि कोर्ट परिसर में खुद को बम लगाकर उड़ाने वाले कोई आत्मघाती तालिबानी या लिट्टे का सदस्य नहीं है, इसका मस्तिष्क परिवर्तन एक आत्मघाती आतंकी के रूप में नहीं किया गया, फिर भी आखिर क्यों इस आम आदमी को यह कदम उठाना पड़ा। उम्मीद की जा सकती है कि समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार से जन्मी वेदनाओं और अघोषित 'लाचारी' ने इस आम आदमी को चारों ओर से घेरा होगा तब जाकर उसने अपनी इहलोक की लीला समाप्त करने का मन बनाया होगा। हां, यह जरूर है कि इसी तंत्र के लोग उसे दिमागी रूप से पीड़ित बता देंगे, मगर एक भला मानुष क्यों इस स्तर पर पहुंचा इसका जवाब कोई नहीं देगा।अब एक और दर्दनाक घटना रोहतक की जिस पर मीडिया ने 'चुस्की' के साथ खबर भी दिखाई कि महिला का बलात्कार कुछ अधिकारी करते हैं और तीन साल तक न्याय की आस में दर-दर भटकने के बाद लाचार दंपति ने सरकारी कार्यालय में आत्महत्या का प्रयास किया। पीड़िता तो मर गई पति बच गया और अब अपनी ही पत्नी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में जेल में है। दो बच्चियां दो महीनों से भी अधिक समय से धूप-छांव को भूल सड़क के किनारे अपने बूढ़े दादी-दादा के साथ इंसाफ की लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए धरने पर बैठ गईं। पिता की रिहाई की मांग है... मगर 'अंधा, बहरा और निरंकुश हो चुका प्रशासन बर्बरता की कहानी को इतिहास के ऐसे पन्ने में छुपाने की बेशर्मी से कोशिश में लगा है ताकि कहीं कभी कोई परिस्थिति न बन जाए कि नाम बदनाम हो जाए। मीडिया ने बच्चों का रोना देखा, दिखाया और दो महीनों से अधिक समय सड़क के किनारे गुजार चुके बच्चों की बदौलत असमंजस में पड़े प्रशासन ने बच्चियों को रात के अंधेरे में उठवा लिया और अन्यत्र कहीं भेज दिया ताकि मीडिया की बोलती भी बंद हो जाए। इस पूरे घटनाक्रम में निष्पक्ष जांच की मांग है जो पूरी करने के बजाय मामला दबाने का सरेआम प्रयास जारी है।
आम आदमी की मौत आसान बन गई जो कभी सही मायनों में खबर नहीं बन पाई। मगर इसके पीछे व्याप्त संदेश को देखने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है। देश में चारों ओर आम आदमी के भीतर असुरक्षा, अपमान, निराशा का अंधकार, असंतोष आदि घर करता जा रहा है और गांव के गांव, शहर के शहर अशांत होते जा रहे हैं। नक्सलवादियों, अलगाववादियों, प्रांतवादियों और भाषावाद करने वालों को समर्थन भी इन्हीं में किसी कारण की वजह से मिल रहा है।
कहीं न कहीं कथित रूप से लोकतांत्रिक सरकारों और उनके मातहत काम करने वाले शासन और प्रशासन के अधिकारी के प्रति विश्वास में लगातार कमी होती जा रही है।आजाद देश में ऐसी लाचारी की कल्पना शायद की किसी आजादी के मतवाले ने की होगी मगर सांसदों, विधायकों, सभासदों, नगरसेवकों और अन्य छुटभैये नेताओं की नजर में यह दर्द किसी काम का नहीं है। बड़ी-बड़ी पार्टी के नेता मुद्दे तलाशते हैं मगर जनहित में एक भी ऐसा काम नहीं करते की उन आत्माओं को शांति मिले जो हंसते-हंसते स्वराज की कामना लिए बलि की वेदी पर चढ़ गए।खबरें, जिनको उद्धृत किया गया है।

http://khabar.ndtv.com/2009/08/20132836/Rohtak-story.html http://khabar.ndtv.com/2009/07/10195954/Arrah-court.html
http://khabar.ndtv.com/2009/07/17153735/Reeta-story.html
http://khabar.ndtv.com/2009/07/17110515/Mayawati-story.html
http://khabar.ndtv.com/2009/07/20110956/Intezaar-Abidi.html
http://khabar.ndtv.com/2009/07/16164431/Maya-old-stmt.html

Monday, January 26, 2009

हमारे हुक्मरान ही बने हमारे दुश्मन

मुंबई हमले पर मीडिया रिपोर्टिंग और लाइव कवरेज से बवाल खड़ा हो गया। सरकार की आंखें तो खुली, मगर उसके हालिया कदम की आहट से ऐसा लगा जैसे सरकार ऐसे किसी मौके की तलाश में थी कि टीवी चैनलों पर तुरंत किसी भी रूप में लगाम लगा दी जाए।कारण साफ ही है कि जहां एक ओर इन्हीं टीवी चैनलों की आंख से पूरा देश अनगिनत अपराधों, भ्रष्टाचार और देश के वास्तविक हालातों से रूबरू हो रहा है, वहीं लगभग सभी राजनीतिक दलों की सरकारों और भीतरी भ्रष्टाचार भी उजागर हो रहे हैं।यहां तक की इसी माध्यम ने देश में लोकतंत्र के ही एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ अर्थात न्यायपालिका पर अपनी आंख टेढ़ी कर डाली।
दशकों से प्रताड़ित जनता की आवाज को एक मतलब दिलवाया। अपने इन कामों से मीडिया ने लोकतंत्र के सही मायने को धरातल पर उतार कर अपना दायित्व निभाया है।ये इस देश और देशवासियों का दुर्भाग्य ही है कि जो भी इस देश की ताकत है, उसे यहां की सरकार और सरकारी हुक्मरान पसंद नहीं करते। इनमें इस देश की भ्रष्ट पार्टियों के भ्रष्ट नेताओं के साथ-साथ देश की भ्रष्ट नौकरशाही भी शामिल है।वैसे कहने को ही ताकत का विकेंद्रीकरण करने की बात कही जाती है। जबकि, सही मायने में यह तभी सफल माना जा सकेगा, जब एक आम आदमी बिना किसी सिफारिश के थाने में अपनी रपट लिखवा पाएगा और उस पर की गई त्वरित कार्रवाई पर संतोष रख पाएगा। जब एक किसान को उसका वाजिब हक बिना किसी नेता की मदद के आसानी से मिल माने या न माने इस देश में एक आम आदमी की राय यही है कि मात्र मीडिया, चाहे वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या फिर प्रिंट, ने ही देश को बरबाद होने से बचा रखा है। इसके अनगिनत उदाहरण हैं, जिन्हें गिनाने की जरूरत नहीं। वहीं, इस बात के भी अनगिनत उदाहरण हैं कि देश की बागडोर संभालने वाले नेताओं और नौकरशाहों ने लोगों को बेवकूफ बनाकर मात्र स्वहित और अपनी जेब का ख्याल रखते हुए लोगों पर आफतें ही लादी हैं।
एक बात के लिए संसद का धन्यवाद किया जाना चाहिए कि उन्होंने आजाद देश इतना बढ़िया काम कर दिया, जिसके लिए देश का हर नागरिक उसका आभारी रहेगा और वह है- देश में सूचना के अधिकार को लागू करना। यहां तक तो ठीक रहा, लेकिन इस कानून के लागू करने के बाद जब नेताओं और नौकरशाहों को यह समझ में आया कि यह तो उनके खिलाफ भी जा रहा है। फिर क्या था तुरंत कानून में फेरबदल कर दिए गए।कई ऐसे परिवर्तन किए गए, ताकि भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ा रहे। 117 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में सरकारी नौकरियों में कार्यरत लोगों को छोड़ दिया जाए तो मात्र कुछ लाख लोग ऐसे होंगे, जिन्हें यह मालूम होगा कि सरकारी महकमे किसी भी काम की जब फाइल बनती है तो उसी फाइल पर सरकारी नोटिंग होती है, जो फाइल का भाग्य तय करती है। यही नोटिंग सरकारी कार्यालय पर विभिन्न स्तरों पर सरकारी अधिकारियों की संबंधित मुद्दे पर की गई टिप्पणी की गवाह होती है। यह नोटिंग बताती है कि किस अधिकारी ने कहां क्या कहा और क्यों तथा कैसे काम हुआ या फिर नहीं हुआ।एक बात और समझने की यह है कि आखिर इस देश के हित के लिए ऐसी कौन सी फाइल है, जिसकी जानकारी इस देश के नागरिक को नहीं दी जा सकती। रक्षा सौदों की या फिर उन जासूसों से संबंधित जो कभी भारतीय कैबिनेट का हिस्सा रहे हैं। जी हां, हाल ही में एक भारतीय लेखक ने अपनी किताब के माध्यम से सीआईए की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि 1971 के युद्ध के दौरान अमेरिका का एक जासूस भारतीय कैबिनेट में था। यहीं यह भी बताना जरूरी है कि भारत के पाकिस्तान के आक्रमण के जवाब को कमजोर करने और भारत को वापसी पर मजबूर करने के लिए अमेरिका की नौसेना का एक बेड़ा भारतीय समुद्री सीमा के करीब पहुंच गया था।
मतलबयह कि सरकार का सारा काम और सरकार की आंखें, हाथ, पांव और यहां तक की दिमाग भी नौकरशाह होते हैं। यही नौकरशाह या कहें बड़े अधिकारी सरकारी योजनाओं कि क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होते हैं। योजना बनाते भी यही हैं। फाइलों में इन्हीं अधिकारियों की टिप्पणी पर कार्यवाही आगे बढ़ती है और अंत में तय हो जाता है कि काम होना है या नहीं... या फिर किसका काम होना है और किसका नहीं। यहां तक कि इन सबके पीछे कारणों की भी जानकारी कई बार इसी नोटिंग में मिल जाती है।सूचना के अधिकारों के तहत जब इसको जानने की बात आई तो पहले सरकार मान गई लेकिन बाद में इस हिस्से को ही काट देने का प्रयास किया गया। आखिर क्यों... जो सरकार पहले इस बात को तैयार थी कि नोटिंग भी सूचना के अधिकार के तहत दिखाए और उपलब्ध कराए जा सकते हैं। वह बाद में लोगों की पहुंच से हटा दिए गए। मायने तो साफ हैं कि लोकतंत्र में लोगों से ही आंख मिचौली। उनके भविष्य और सूचना के अधिकारों तक पर रोक। उनके सामने परिणाम हैं, मगर परिणाम के कारणों पर पर्दा पड़ा रहेगा। इसे ऐसे भी सकते हैं कि अपराध तो होगा, मगर अपराधी कौन है, यह आम नागरिक नहीं जान सकता है।मुद्दा सूचना के अधिकार पर चली कैंची का नहीं है, मगर देश में आज आम नागरिक के हाथों की ताकत बने और साथ ही हुक्मरान की मनमर्जी पर अंकुश के साथ नजर रखने वाली मीडिया पर भी अपना कब्जा बढ़ाने की नीयत से सरकार कानून बनाने की ओर अग्रसर है। क्या यह होने दिया जाना चाहिए, आप तय करें।अकबर इलाहाबादी ने अरसे पहले यह लिखा 'न तीर निकालो, न तलवार निकालो, लड़ना है तो यारो अखबार निकालो'। गुलाम भारत में कलम ने पुरजोर तरीके से अपना काम बखूबी निभाया। शायद ही ऐसा कोई नेतृत्व रहा हो, जिसने खास और आम तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए कलम की धार का इस्तेमाल न किया हो। एक साथ लाखों लोगों को जागरूक करने, संवेदनशील बनाने और हक की लड़ाई के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ आगे आकर लड़ने को तैयार किया।आज़ादी के बाद पत्रकारिता के मायनों और दिशा पर बुद्धिजीवियों ने कई मंचों पर चर्चा की, परंतु एकमत नहीं हो पाए। और दिशाहीन पत्रकारिता आज समय के थपेड़ों को झेलते हुए बाजारोन्मुख हो चुकी है। आजादी को अब 60 वर्ष से ज्यादा हो चले है और अखबार के साथ-साथ अब टीवी पर न्यूज चैनलों का जमाना है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप से अपने स्थापित करने वाली पत्रकारिता के लिए दिशा तय करना अब बेहद आवश्यक हो चला है। शायद इस देश का जागरूक मीडिया इस देश की बड़ी ताकत है। गलतियां किससे नहीं होती, मीडिया बढ़ रहा है, गलती हुई है, तो सुधार भी होगा। मीडिया ने अपने ऊपर स्वयं बंदिशें लगाई हैं। उम्मीद है कामयाब होंगे, लेकिन आवाज उठनी चाहिए, ताकि सरकार या नौकरशाह अपने शिंकजे में मीडिया को कसने न पाएं।